"मन व्यथा" By Chandrasingh

 हुस्न के बाजार में, लगी परियोंकी लाइन,

लव नही लस्ट है यह!!

बिकता कोई रोटी खाने, रोटी वाले बोटी नोचने,

लव नही लस्ट है यह!!

शाम ढले सुबह होती, पेट बचाने बदन बेचती,

लव नही नर्क है यह!!

मेकअप करके, मुंह सजाती, मुंह के बल धंधा चलाती, 

लव नही नर्क है यह!!


कहत "चंद्र", क्यों पढ़े, आखिर करनी थी चोरी!

बच्चे पढ़ाने वाले, बेच रहे क्यों पेपर?

क्या मजबूरी रही उनकी, थी सरकारी नोकरी!

क्या जरूरत थी उनकी, क्यों बेचा सम्मान!

क्यों फाड़ा पेट उनका, पढ़ें जो रातदिन!

क्यों तोड़ी आस उनकी, बहाए जो पसीनाखून!


शर्म करो ओ, शासन वालों!

शर्म करो ओ, प्रशासन!

वैश्या सी तो न थी जिंदगी, जो मजबूरीमे  लेटी!

तुम भले समाज में पले,  हरपल वो गालियां खाती!

जिस्म बैचके खुश करती, पेपर बैचके न हुआ दुखी?

पेट न तेरा  इतना मोटा, दिया सबको समान।


डर, ओ इंसान की औलाद! 

डर, ओ इंसान की औलाद! 

महामारी में दुआ है बड़ी, न बड़ा है धन!

मन तेरा होगा पवित्र, मिलेगा साथ हरदम।


: Chandrasingh G. Parmar, 
  "ચંદ્ર" 
#બાપુ_ઉવાચ

निष्कर्ष: गुजरात में 2014 से जिस तरह स्पर्धात्मक परीक्षाओं के पेपर फुट रहे है, जिस तरह पेपर की चोरी कर लाखो रुपएका काला व्यापार होता है, उसे देख एक उमीदवार के तौर पर यह काव्य की रचना की गई है। मैं यह नहीं कहता की इसमें सरकार सम्मिलित है, पर सरकार की भी इतनी जिम्मेवारी है की सबको समान न्याय मिले, गरीब को बिना पैसे लिए सरकारी नौकरी मिले।
बंधारण के अनुच्छेद 16 के अनुसार, 1) राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी। 2) राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।

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